कानपुर नगर, सरकारी सिस्टम कछ ऐसा बना कि आज ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन (बीआईसी) को अब बद किया जा रहा है। अग्रजा द्वारा सन 1876 में स्थापित इस मिल को आजादी के बाद सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया था। वहीं राजनीति लाभ के लिए 1981 के इंदिरा सरकार ने मिल को अधिग्रहित कर लिया, उससे पहले हजारो कर्मचारी यहां काम करता था। इस मिल में तौलिया, शूटिंग शर्टिंग, बम में लगने वाला कपडा और 60नम्बर लोई केसाथ ब्जेलर, कम्बल बनाया जाता था। वहीं मिल में राजनीति के चलते 2013 से उत्पादन नही हो रहा है तो वहीं यहां पर साढे छै सो से अधिक अधिकारियों तथा कर्मचारियों को बीते 28 महीने से वेतन नहीं मिल रहा है। बीआईसी मिल जो कभी कानपुर की शान हआ करती थी और यहां का बना कपडा विदेशों तक में बिकता था आज वहीं बीआईसी के बंद होने की घोषण की जा चुकी है और बंदी से पहले की प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए फाइल बनने का काम शुरू हो गया है। जानकारों की माने तो इसी वर्ष मिल को बंद कर दिया जायेगा। कम्पनी की सभी सम्पतितयों, कम्पनी पर चल रहे मुकदमों तथा उन सम्पत्तियों पर कब्जो को लेकर सूची बनाई जा रही है। वहीं बीआईसी की सम्पत्तियों में बहुत अनियमितताये बरती गयी है। मिल के कुछ बडे अधिकारियों ने मिल के 27 बंगलो को शहर के रईयों को बेंचकर अपनी जेबें भरी है और इस मामले में सीबीआई की जांच भी की जा रही है। यहां के कर्मचारियों की माने तो बीआईसी द्वारा लाल इमली कानपुर में तथा पंजाब प्रांत में धारीवाल मिल का संचालन होता था। यह पर मौजूद रेलवे ट्रैक यहां के उत्पादन की गवाह है। राजनीति के चलते अब मिल बंद होने की कगार पर है साथ ही यहां के कर्मचारियों को अभी तक वेतन नही मिला है। बीआईसी से जुडी बहुत सम्पत्तियां है जिसका आंकलन किया जा रहा है वहीं देनदारी का भी लेखाजोखा तैयार हो रहा है यह भी पता लगाया जा रहा है कि किन सम्पत्तियों पर मकदमा है या नही। आज भी भले ही मिल में उत्पाद बंद हो लेकिन मिल सीना ताने खडी है और कानपुर के गौरव का प्रतीक बनी है। ऐसे में मिल बंद होने की सूचना पर मिल के सभी कर्मचारियो के साथ ही आसपास रहने वाले लोगों को इस बात का मलाल है। उनका कहना है कि मिलें ही कानपुर की पहचान थी।
इसी साल बंद हो जायेगी बीआईसी